एमी, 


ये ख़त दरअस्ल ज़िद है और कुछ नहीं । ज़िद तुम्हें ख़त लिखते रहने की, ज़िद तुमसे वस्ल की उम्मीद पे ज़िन्दा रहने की और ज़िद इस दुनियावी तौर तरीकों में बने रहने की। कहते हैं ये हफ़्ता मुहब्बत का है.. कोई बताए भला कि कौन सा हफ़्ता है जो मुहब्बत का नहीं होता । ख़ैर, ये भागती-हाँफती दुनिया अगर ठहरकर ही मुहब्बत जताना चाहती है तो वो ही सही मगर काश यही होता कि इस एक हफ़्ते को ही सही पूरी दुनिया नफ़रत भूल जाती, हर तरफ़ बस मुहब्बत के रंग खिलते... न किसी से शिकवा होता, न कोई नाराज़गी, न रंज होते, न जंग, न ज़ात और मज़हब की दीवारें, मगर ऐसा होता नहीं है एमी। न जाने क्यों नहीं होता?  

शिकवा, शिकायतें, झगड़े, नफ़रत इन सबमें कितनी मेहनत है एमी और मुहब्बत में क्या, केवल मुहब्बत लेकिन लोगों से इतना भी नहीं होता...

ख़ैर, मैं भी किन बातों में रह गया, तुम ये बताओ एमी कि क्या मुस्कुराते फूलों से तुम्हे भी मेरी महक आती है? क्या किसी बुज़ुर्ग जोड़े को एक दूसरे का हाथ थामे देखकर तुम्हे भी ये तसव्वुर हुआ कि ये हम हैं या दो हमउम्र बच्चे-बच्ची को खिलखिलाता देख ये तक़लीफ़ हुई कि हमने बचपन मे न मिलकर कितना वक़्त ज़ाया किया? क्या तुमने भी घन्टो मेरे इंतज़ार में , ख़ुद से बातें की है, जबकि ये मालूम है कि हम दुनिया के दो अलग कोनों में हैं? क्या तुमने भी हरेक ख़त को उसी हसरत से बार बार पढ़ा, जैसे कोई रात के 3 बजे सिगरेट का आख़िरी कश खींच रहा हो? 

ओह, एमी मैं न आज जाने कैसी बहकी बहकी बातें कर रहा हूँ और ऐसा लग रहा है कि कब से ये सब लिख रहा हूँ, जैसे लिखते हुए कई साल गुज़र गए हों। न जाने कैसी कैफ़ियत है आज मुझपर।  

अभी और नहीं लिख पाउँगा। कुछेक गुस्सा, कुछेक मनाना, कुछेक प्यार, कुछेक बोसे... सारे जज़्बात की पोटली रख दी है इस लिफ़ाफ़े में। जो ख़त पहुँचे तो ख़ैरियत लिखना।


तुम्हारा 

इलोन


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तस्वीर - इंटरनेट

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