Aditya Bhushan Mishra भाई ❤️
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एमी,
कौन नहीं जानता कि ये वक़्त कितना मुश्किल गुज़र रहा है, जिधर देखो मौत हँस रही है । हम एक अनजान, पोशीदा दुश्मन की ज़द में हैं, जिससे लड़ना आसान नहीं जान पड़ता । उसके हमले से बचने को हमारे पास कुछ उम्मीदों और कोशिशों के सिवा कुछ भी नहीं और हमला ऐसा कि इंसान साँसों की उम्मीद में, बेबसी से तड़प के मर जाए । कभी- कभी सोचो तो यूँ लगता है कि जैसे अलिफ़-लैला के ज़माने का कोई शैतान ये सब कर रहा हो।
और मैं कि अपनी मजबूरियों में क़ैद इन दिनों तुमसे ख़ैरियत भी न पूछ सका। मगर तुम यक़ीन जानो एमी कि तुम्हें न लिख पाते हुए मैं भी उन दिनों किसी तौर ख़ुश नहीं होने पाया। ऐसा कुछ था जो ठीक होते हुए भी नहीं था....ऐसा लगता था मानो कुछ छूट रहा हो.. जैसे ग़मों के लश्कर घेर रहे हों मुझे । उन दिनों उदासी चुपके से पास आकर बैठ जाया करती थी....यूँ महसूस होता था जैसे कोई तलाश अधूरी रह गयी हो...जैसे ये पूरी दुनिया मनहूस हो गयी हो और मैं अपने आप से पराया ।
एमी,तुमने भी इंतज़ार के दिन कैसे काटे होंगे ये एहसास है मुझे और ये मालूम भी कि तुम इसकी शिक़ायत भी नहीं करोगी लेकिन इस बात से मेरा क़सूर तो कम नहीं होगा एमी, न तुम्हारे इंतज़ार के लम्हें लौटेंगे, न उसकी तपिश कम होगी । अगर अपनी ग़लतियों का एहसास हो जाए एमी तो सज़ा का न मिलना ही ज़्यादा बड़ी सज़ा हो जाती है, सो अगले ख़त में तुम अपनी नाराज़गी ज़रूर लिखना और हो सके तो कोई सज़ा भी मुक़र्रर कर देना कि मैं अपने दिल के बोझ को कुछ कम कर सकूँ।
यूँ तो इससे बड़ी सज़ा क्या है कि हम पास होकर भी पास नहीं हैं...ये ख़ुतूत सब एहसास बयाँ तो कर सकते हैं लेकिन कभी तुम्हारी तरह हाथ पकड़कर अपने पास तो नहीं बैठा सकते.... न कभी गले लगकर ये कह सकते कि मैं तुम्हारे साथ हूँ और न कभी मेरा सर अपनी छाती से लगाकर या अपनी गोद मे रखकर मुझे इस दुनियावी कश्मकश से दूर ही ले जा सकते है।
ये उनकी ग़लती नहीं मजबूरी है, जैसे हमारी ये कि हम कभी मिल नहीं सकते। मैं सब ये जानता हूँ, मगर फिर भी इन दिनों ये एक बात मुझे परेशान करती रही एमी कि अगर साँसों ने मेरा साथ भी छोड़ दिया तो जाते हुए तुम्हें एक बार भी न देख सकूँगा... कभी कभी ये सोचता हूँ एमी कि क्या ज़िंदगी से सिर्फ़ इतना चाहना भी गुनाह है?
तुम्हारा
इलोन
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तस्वीर - इंटरनेट
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