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 Aditya Bhushan Mishra भाई ❤️ ----------------------------------- एमी,  कौन नहीं जानता कि ये वक़्त कितना मुश्किल गुज़र रहा है,  जिधर देखो मौत हँस रही है । हम एक अनजान, पोशीदा दुश्मन की ज़द में हैं, जिससे लड़ना आसान नहीं जान पड़ता । उसके हमले से बचने को हमारे पास कुछ उम्मीदों और कोशिशों के सिवा कुछ भी नहीं और हमला ऐसा कि इंसान साँसों की उम्मीद में, बेबसी से तड़प के मर जाए । कभी- कभी सोचो तो यूँ लगता है कि जैसे अलिफ़-लैला के ज़माने का कोई शैतान ये सब कर रहा हो।  और मैं कि अपनी मजबूरियों में क़ैद इन दिनों तुमसे ख़ैरियत भी न पूछ सका। मगर तुम यक़ीन जानो एमी कि तुम्हें न लिख पाते हुए मैं भी उन दिनों किसी तौर ख़ुश नहीं होने पाया। ऐसा कुछ था जो ठीक होते हुए भी नहीं था....ऐसा लगता था मानो कुछ छूट रहा हो.. जैसे ग़मों के लश्कर घेर रहे हों मुझे । उन दिनों उदासी चुपके से पास आकर बैठ जाया करती थी....यूँ महसूस होता था जैसे कोई तलाश अधूरी रह गयी हो...जैसे ये पूरी दुनिया मनहूस हो गयी हो और मैं अपने आप से पराया ।  एमी,तुमने भी इंतज़ार के दिन कैसे काटे होंगे ये एहसास है मुझे और ये मालूम भी कि त...
 एमी, कई बार लोग मुझसे तुम्हारी बाबत पूछते हैं। तुम्हीं कहो कि मैं किसी को क्या समझा सकता हूँ भला?  मैं कोशिश भी करूँ तो क्या कहूँ?  तुम्हारा नाम वो हल्की सी रोशनी का एहसास है जिससे सर्द रातों में ओस और बर्फ़ से ढका हुआ पूरा पहाड़ चमक उठता है या जैसे बनारस की घाट से उषाकाल में गंगा के पानी पर तैरती वो लालिमा या फिर केरल के किसी सुदूर देहात में बारिश होने से खिल उठे पेड़ों के पत्ते। एमी, मेरे पास वो लफ़्ज़ ही नहीं हैं कि जिनसे ये बयाँ हो सके कि कैसे तुम्हारे साथ मैं अमावस की रात में भी चांदनी देख सकता हूँ... कैसे तुम्हारे साथ मेरे लिए दुनिया की कोई भी ज़बान मुश्किल नहीं रह जाती... कैसे तुम्हारे साथ मैं आकाश के सभी तारे गिन लेता हूँ, कैसे रेत के टीलों पर चढ़कर बादलों को पकड़ लेता हूँ या कैसे समंदर में तैरती मछलियों से बात कर लेता हूँ... एमी, तुम वो हरेक ख़त हो जिसे इलोन ने लिक्खा है... तुम वो टेबल लैंप हो जिसके नीचे बैठकर ये ख़त लिखे गए हैं...तुम वो रोशनाई, वो दावात, वो पेंसिल, वो कलम, वो कीबोर्ड हो जिससे तुम्हें लिखा गया है लेकिन इन्हें ये बात कैसे समझ आएगी? इन्हें एहसास समझ नहीं आत...
 एमी,  ये ख़त दरअस्ल ज़िद है और कुछ नहीं । ज़िद तुम्हें ख़त लिखते रहने की, ज़िद तुमसे वस्ल की उम्मीद पे ज़िन्दा रहने की और ज़िद इस दुनियावी तौर तरीकों में बने रहने की। कहते हैं ये हफ़्ता मुहब्बत का है.. कोई बताए भला कि कौन सा हफ़्ता है जो मुहब्बत का नहीं होता । ख़ैर, ये भागती-हाँफती दुनिया अगर ठहरकर ही मुहब्बत जताना चाहती है तो वो ही सही मगर काश यही होता कि इस एक हफ़्ते को ही सही पूरी दुनिया नफ़रत भूल जाती, हर तरफ़ बस मुहब्बत के रंग खिलते... न किसी से शिकवा होता, न कोई नाराज़गी, न रंज होते, न जंग, न ज़ात और मज़हब की दीवारें, मगर ऐसा होता नहीं है एमी। न जाने क्यों नहीं होता?   शिकवा, शिकायतें, झगड़े, नफ़रत इन सबमें कितनी मेहनत है एमी और मुहब्बत में क्या, केवल मुहब्बत लेकिन लोगों से इतना भी नहीं होता... ख़ैर, मैं भी किन बातों में रह गया, तुम ये बताओ एमी कि क्या मुस्कुराते फूलों से तुम्हे भी मेरी महक आती है? क्या किसी बुज़ुर्ग जोड़े को एक दूसरे का हाथ थामे देखकर तुम्हे भी ये तसव्वुर हुआ कि ये हम हैं या दो हमउम्र बच्चे-बच्ची को खिलखिलाता देख ये तक़लीफ़ हुई कि हमने बचपन मे न मिलकर कितना वक़्त ज़ा...
 एमी, बाहर की ठंड अब कुछ कम हो चली है फरवरी का महीना चल रहा है और लोग इश्क़ की खुमारी में डूबे हुए हैं। यूँ तो मुझे कभी नहीं लगा एमी कि इश्क़ का कोई तय वक़्त हो सकता है मगर फिर यूँ भी सोचता हूँ कि अगर एक दिन को भी पूरी दुनिया सिर्फ इश्क़ में झूम उठे तो उस दिन ये दुनिया कितनी सुंदर होगी न।   एमी ये सवाल तो सदियों से चला आ रहा है कि इश्क़ है क्या और कोई भी कभी उसका निश्चित उत्तर न पा सका है लेकिन मुझे लगता है एमी कि इश्क़ एक मानसिक अवस्था है जिसमें या तो आप होते हैं, या नहीं होते। अगर हुए तो जेठ की दुपहरी भी जाड़े की नरम धूप सी लगती है और जाड़े की सनसनाती हवा भी किसी के आलिंगन सी, रात के अंधेरे डराने के बजाए मन को गुदगुदाते हैं और पसीना भी इत्र सा महकता रहता है और अगर इश्क़ में नहीं हुए तो दुनिया की तमाम सुंदरता भी मन को कुरूप और कसैली ही लगती है। दिन के उजाले भी काटने को दौड़ते हैं, फागुन का मंद-मंद बहता पवन भी चुभता है और सावन की पहली फुहार भी आपको परेशान करने की कुदरत की साजिश ही मालूम पड़ती है।  एमी, इश्क़ भी अजीब है न। अब देखो न इश्क़ में पड़ा हुआ इंसान किसी से नफरत ही नहीं कर ...
 एमी, इन दिनों कई ख़त तुम्हारे नाम लिखे लेकिन फिर उन्हें पोस्ट नहीं किया। जाने क्या है जो कभी कभी डराता है मुझे...जब बहुत बातें इकट्ठी हो जाती हैं तो मैं बोल नहीं पाता एमी। नहीं, तुमसे भी नहीं... सारी बातें सीने में उलझ कर रह जाती हैं। मैं हड़बड़ाहट महसूस करने लगता हूँ, मेरा सीना ज़ोर ज़ोर से उछलने लगता है और मैं कुछ नहीं बोल पाता, कुछ भी नहीं।   इन दिनों मैं बीमार भी रहा एमी, लेकिन मर सकूँ इतना सुकून इकट्ठा नहीं कर पाया, फिर ज़िन्दगी में तुमसे एक बार मिलने की ख्वाहिश ने ही शायद ज़िन्दगी को साँसे लौटा दी। ख़ैर, जानती हो एमी,आज अमृता का जन्मदिन है, हाँ वही "वारिश शाह" वाली अमृता। हां वही "अदालत" वाली अमृता जिसकी नायिका के हाथ का स्पर्श सालों बाद भी नायक के कोट के जेब में रह जाता है। हमारा भी तो कितना कुछ एक दूसरे के पास है न एमी? हमारे आँसू, हमारा लम्स, हमारे बोसे कितना कुछ? पता है एमी, अमृता कहती हैं के " प्रेम में पड़ी स्त्री को तुम्हारे साथ सोने से ज़्यादा अच्छा लगता है तुम्हारे साथ जगना"। मैं तो कहता हूँ एमी के पुरूष को भी प्रेम में जगना ही अच्छा लगता है। हालाँकि...